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कविताः उसके दो नैना

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कविताः उसके प्यारे दो नैना   उसके दो नैना एक दूजे के दिवाने बने बैठे है  एक साथ तकते है झपकते है उसके दो नैना एक दूजे के दिवाने बने बैठे है फिक्र को पलकों पर बैठाये बोझ लिये सपनों का अजीब सी, हैरानी भरी निगाहों से हर पल  एक दूजे को अपना प्यार जताते है उसके दो नैना उसके दो नैना एक दूजे के दिवाने बने बैठे है  पर कभी एक दूजे को देख न पाते है एक साथ तकते है झपकते है  उसके दो नैना एक दूजे के दिवाने बने बैठे है।  

ब्रिक्स सम्मेलन के बहाने रूस की भारत और चीन के रिश्तों को सुधारने का प्रयास

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ब्रिक्स सम्मेलन के बहाने रूस की भारत और चीन के रिश्तों को सुधारने का प्रयास ब्रिक्स सम्मेलन में भारत और चीन के बीच संबंधों में आए बदलाव निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और अन्य मतभेदों के बावजूद, हाल के वर्षों में दोनों नेताओं के बीच कई द्विपक्षीय बैठकें हुई हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि दोनों देशों के बीच सहयोग वैश्विक स्तर पर स्थिरता और विकास के लिए महत्वपूर्ण है। बढ़ती नजदीकियों के संभावित कारण: आर्थिक हित: दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंध काफी मजबूत हैं। ब्रिक्स सम्मेलन के मंच पर, दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए कई समझौते हुए हैं। वैश्विक राजनीति: बदलते वैश्विक साझेदार के रूप में देख रहे हैं। बहुपक्षीय मंच है, जहां वे वैश्विक मुद्दों पर अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। क्षेत्रीय सहयोग: दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। संभावित प्रभाव: क्षेत्रीय स्थिरता: भारत और चीन के बीच बेहतर संबंध क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं। ...

एक पिता की कलम से

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आज बहुत मुझे पिता बने दस माह से ज्यादा हो चुका है। इन बीच मैने अपने बेटे को थोडा बहुत जाना किन्तु उससे कहीं ज्यादा मुझे मेरे पिता के बारे में पता लगा कि, किस तरह का प्यार एक पिता अपने बेटे या बेटी से कर सकता है। मुझे सात से आठ माह लग गये यह समझने में कि मै एक पिता बन चुका हूँ। जो हल मन मे हर समय होती रहती है वह क्यों होती है इस बात का एहसास होते हुये भी इस सम्बन्ध में कुछ न कह पाने की स्थिति में हर वक्त रहा। एक पिता किस तरह से अपने आपको सम्भालते हुये अपने बेटे या बेटी के भविष्य में पहले दिन से सोचने लगता है । यही नही वह उस दिशा में काम करना भी शुरु कर देता है। मैने अपने बेटे को पहली बार अपने हाथों में लिया तो थोडा से डर को अनुभूति किया कि क्या में अभी इस लायक हूँ । क्या में इसे सम्भाल सकता हूँ। फिर धीरे धीरे जैसे  दिन गुजरते गये तो मैने पाया कि मुझे इस दिशा में कोई विशेष काम करनी की जरुरत नही बल्कि मुझे स्वाभाविक रुप से रहना है।