एक पिता की कलम से
आज बहुत मुझे पिता बने दस माह से ज्यादा हो चुका है। इन बीच मैने अपने बेटे को थोडा बहुत जाना किन्तु उससे कहीं ज्यादा मुझे मेरे पिता के बारे में पता लगा कि, किस तरह का प्यार एक पिता अपने बेटे या बेटी से कर सकता है। मुझे सात से आठ माह लग गये यह समझने में कि मै एक पिता बन चुका हूँ। जो हल मन मे हर समय होती रहती है वह क्यों होती है इस बात का एहसास होते हुये भी इस सम्बन्ध में कुछ न कह पाने की स्थिति में हर वक्त रहा। एक पिता किस तरह से अपने आपको सम्भालते हुये अपने बेटे या बेटी के भविष्य में पहले दिन से सोचने लगता है । यही नही वह उस दिशा में काम करना भी शुरु कर देता है। मैने अपने बेटे को पहली बार अपने हाथों में लिया तो थोडा से डर को अनुभूति किया कि क्या में अभी इस लायक हूँ । क्या में इसे सम्भाल सकता हूँ। फिर धीरे धीरे जैसे दिन गुजरते गये तो मैने पाया कि मुझे इस दिशा में कोई विशेष काम करनी की जरुरत नही बल्कि मुझे स्वाभाविक रुप से रहना है।